अथर्ववेद (कांड 12)
वि॒मृग्व॑रीं पृथि॒वीमा व॑दामि क्ष॒मां भूमिं॒ ब्रह्म॑णा वावृधा॒नाम् । ऊर्जं॑ पु॒ष्टं बिभ्र॑तीमन्नभा॒गं घृ॒तं त्वा॑भि॒ नि षी॑देम भूमे ॥ (२९)
धर्मरूपिणी, परम पवित्रा तथा मंत्रों के द्वारा बढ़ने वाली पृथ्वी की मैं स्तुति करता हूं. हे पृथ्वी! तू पोषक अन्न और बल को धारण करने वाली है. मैं तुझ पर घृत की आहुति देता हूं. (२९)
I praise Dharmarupini, the supreme purity and the earth that grows through mantras. O earth! You are going to possess nutritious food and strength. I sacrifice hatred on you. (29)