अथर्ववेद (कांड 12)
जनं॒ बिभ्र॑ती बहु॒धा विवा॑चसं॒ नाना॑धर्माणं पृथि॒वी य॑थौक॒सम् । स॒हस्रं॒ धारा॒ द्रवि॑णस्य मे दुहां ध्रु॒वेव॑ धे॒नुरन॑पस्फुरन्ती ॥ (४५)
अनेक धर्मो और अनेक भाषाओं वाले मनुष्यों को धारण करने वाली पृथ्वी अडिग धेनु के समान मेरे लिए धन की हजारों धाराओं को दुहाए. (४५)
May the earth, which holds human beings of many dharmas and many languages, cry out thousands of streams of wealth for me like a firm dhenu. (45)