हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.1.46

कांड 12 → सूक्त 1 → मंत्र 46 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
यस्ते॑ स॒र्पो वृश्चि॑कस्तृ॒ष्टदं॑श्मा हेम॒न्तज॑ब्धो भृम॒लो गुहा॒ शये॑ । क्रिमि॒र्जिन्व॑त्पृथिवि॒ यद्य॒देज॑ति प्रा॒वृषि॒ तन्नः॒ सर्प॒न्मोप॑ सृप॒द्यच्छि॒वं तेन॑ नो मृड ॥ (४६)
हे पृथ्वी! तुम में जो सर्प निवास करते हैं, उन का दंश प्यास लगाने वाला है. तुम में जो बिच्छू हैं, वे हेमंत ऋतु में डंक नीचे किए हुए गुफा में शयन करते हैं. वर्षा ऋतु में प्रसन्नता पूर्वक विचरण करने वाले ये प्राणी अर्थात्‌ सांप और बिच्छू मेरे समीप न आएं. (४६)
O earth! The bite of the serpents that dwell in you is the one who thirsts. The scorpions among you sleep in the cave with the sting down in the hemant season. These creatures, i.e. snakes and scorpions, who roam happily in the rainy season, should not come near me. (46)