अथर्ववेद (कांड 12)
ये ते॒ पन्था॑नो ब॒हवो॑ ज॒नाय॑ना॒ रथ॑स्य॒ वर्त्मान॑सश्च॒ यात॑वे । यैः सं॒चर॑न्त्यु॒भये॑ भद्रपा॒पास्तं पन्था॑नं जयेमानमि॒त्रम॑तस्क॒रं यच्छि॒वं तेन॑ नो मृड ॥ (४७)
हे पृथ्वी! मनुष्यों के चलने के और रथ आदि के चलने के जो मार्ग हैं, उन मार्गो पर धर्मात्मा और पापात्मा दोनों प्रकार के मनुष्य चलते हैं. जो मार्ग चोरों और शत्रुओं से हीन है, उसी कल्याणमय मार्ग के द्वारा तुम हमें सुखी बनाओ. (४७)
O earth! Both righteous and papatma walk on the paths of walking of human beings and the walk of chariots etc. Make us happy through the path which is inferior to thieves and enemies. (47)