हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.1.55

कांड 12 → सूक्त 1 → मंत्र 55 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
अ॒दो यद्दे॑वि॒ प्रथ॑माना पु॒रस्ता॑द्दे॒वैरु॒क्ता व्यस॑र्पो महि॒त्वम् । आ त्वा॑ सुभू॒तम॑विशत्त॒दानी॒मक॑ल्पयथाः प्र॒दिश॒श्चत॑स्रः ॥ (५५)
हे पृथ्वी! तुम्हारे विस्तृत होने से पहले देवताओं ने तुम से विस्तार वाली होने को कहा था. उस समय तुम में भूरतों ने प्रवेश किया. तभी चार दिशाएं बनाई गई. (५५)
O earth! Before you expanded, the gods told you to be expanded. At that time the bhurats entered you. Then four directions were made. (55)