अथर्ववेद (कांड 12)
अ॒हम॑स्मि॒ सह॑मान॒ उत्त॑रो॒ नाम॒ भूम्या॑म् । अ॑भी॒षाड॑स्मि विश्वा॒षाडाशा॑माशां विषास॒हिः ॥ (५४)
मैं पृथ्वी पर शत्रु का तिरस्कार करने वाले के रूप में प्रसिद्ध हूं. मैं अपने शत्रुओं के सामने जा कर उन्हें दबाऊं. मैं हर दिशा में रहने वाले शत्रु को भलीभांति वश में कर लूं. (५४)
I am famous on earth as the one who despises the enemy. I should go in front of my enemies and suppress them. I should control the enemy living in every direction. (54)