अथर्ववेद (कांड 12)
न॒डमा रो॑ह॒ न ते॒ अत्र॑ लो॒क इ॒दं सीसं॑ भाग॒धेयं॑ त॒ एहि॑ । यो गोषु॒ यक्ष्मः॒ पुरु॑षेषु॒ यक्ष्म॒स्तेन॒ त्वं सा॒कम॑ध॒राङ्परे॑हि ॥ (१)
हे क्रव्याद अग्नि! तू नड अर्थात् सरकंडे पर आरोहण कर. जो यक्ष्मा रोग मनुष्यों में अथवा जो यक्ष्मा गौ में है, तू उस के साथ यहां से दूर चली जा. तू अपने भाग्य की सीमा पर आ. (१)
O agni! You climb on the river. Go away from here with the tuberculosis disease that is in humans or the tuberculosis that is in cow. Come to the limits of your destiny. (1)
अथर्ववेद (कांड 12)
अ॑घशंसदुःशं॒साभ्यां॑ क॒रेणा॑नुक॒रेण॑ च । यक्ष्मं॑ च॒ सर्वं॒ तेने॒तो मृ॒त्युं च॒ निर॑जामसि ॥ (२)
पाप और दुर्भावनाओं का नाश करने वाले कर तथा अनुकर से मैं यक्ष्मा रोग को पृथकू करता हूं. मैं मृत्यु को भी दूर भगाता हूं. (२)
I separate tuberculosis from the tax and compassion that destroys sin and ill-will. I also drive away death. (2)
अथर्ववेद (कांड 12)
निरि॒तो मृ॒त्युं निरृ॑तिं॒ निररा॑तिमजामसि । यो नो॒ द्वेष्टि॒ तम॑द्ध्यग्ने अक्रव्या॒द्यमु॑ द्वि॒ष्मस्तमु॑ ते॒ प्र सु॑वामसि ॥ (३)
हे क्रव्याद अग्नि! हम पाप देवता निर्त्रति और मृत्यु को दूर करते हैं. हम अपने शत्रुओं को भी दूर करते हैं. जो हमारे शत्रु हैं, हम उन्हें तुम्हारी ओर भेजते हैं. तुम उन का भक्षण करो. (३)
O agni! We remove sin, god and death. We also overcome our enemies. Those who are our enemies, we send them towards you. You eat them. (3)
अथर्ववेद (कांड 12)
यद्य॒ग्निः क्र॒व्याद्यदि॒ वा व्या॒घ्र इ॒मं गो॒ष्ठं प्र॑वि॒वेशान्यो॑काः । तं माषा॑ज्यं कृ॒त्वा प्र हि॑णोमि दू॒रं स ग॑च्छत्वप्सु॒षदोऽप्य॒ग्नीन् ॥ (४)
यदि क्रव्याद अग्नि ने अथवा व्याघ्र ने हमारे गोष्ठ में प्रवेश किया है तो मैं उसे माष अर्थात् उरद आज्य द्वारा दूर करता हूं. (४)
If Kravyad Agni or Tiger has entered our seminar, Then I remove it by Mash i.e. Urad Ajya. (4)
अथर्ववेद (कांड 12)
यत्त्वा॑ क्रु॒द्धाः प्र॑च॒क्रुर्म॒न्युना॒ पुरु॑षे मृ॒ते । सु॒कल्प॑मग्ने॒ तत्त्वया॒ पुन॒स्त्वोद्दी॑पयामसि ॥ (५)
पुरुष की मृत्यु के कारण क्रोधित हुए प्राणियों ने तुम्हें प्रदीप्त किया. वह कार्य पूर्ण हो गया, इसीलिए हम ने तुम्हें तुम से ही प्रदीप्त किया है. (५)
The creatures who were angry due to the death of the man illuminated you. That work has been completed, that is why we have illuminated you from you. (5)
अथर्ववेद (कांड 12)
पुन॑स्त्वादि॒त्या रु॒द्रा वस॑वः॒ पुन॑र्ब्र॒ह्मा वसु॑नीतिरग्ने । पुन॑स्त्वा॒ ब्रह्म॑ण॒स्पति॒राधा॑द्दीर्घायु॒त्वाय॑ श॒तशा॑रदाय ॥ (६)
हे अग्नि! वसु, ब्रह्मणस्पति, ब्रह्म, रुद्र, सूर्यं और वसुनीति ने तुम्हें सौ वर्ष का जीवन प्राप्त करने के लिए पुनः प्रदीप्त किया था. (६)
O agni! Vasu, Brahmanaspati, Brahma, Rudra, Surya and Vasuniti re-illuminated you to get a life of a hundred years. (6)
अथर्ववेद (कांड 12)
यो अ॒ग्निः क्र॒व्यात्प्र॑वि॒वेश॑ नो गृ॒हमि॒मं पश्य॒न्नित॑रं जा॒तवे॑दसम् । तं ह॑रामि पितृय॒ज्ञाय॑ दू॒रं स घ॒र्ममि॑न्धां पर॒मे स॒धस्थे॑ ॥ (७)
अन्य अग्नियों को देखने के लिए यदि क्रव्याद अग्नि हमारे घर में प्रविष्ट हुआ है तो पितृयज्ञ करने के लिए मैं उसे दूर भगाता हूं. वह पाप नाश में स्थित हो धर्म को बढ़ाए. मैं क्रव्याद अग्नि को दूर भगाता हूं. वह पाप को साथ लेता हुआ यज्ञ के स्थान को प्राप्त हो. जातवेद अग्नि यहां प्रतिष्ठित हो कर देवों के लिए हवि वहन करे. (७)
If kravyad agni has entered our house to see other agnis, then I drive it away to perform pitruyagya. He enhances dharma to be located in the destruction of sin. I drive away the agni. He should take sin along and attain the place of yajna. Jataveda agni should be revered here and bear the havi for the gods. (7)
अथर्ववेद (कांड 12)
क्र॒व्याद॑म॒ग्निं प्र हि॑णोमि दू॒रं य॒मरा॑ज्ञो गच्छतु रिप्रवा॒हः । इ॒हायमित॑रो जा॒तवे॑दा दे॒वो दे॒वेभ्यो॑ ह॒व्यं व॑हतु प्रजा॒नन् ॥ (८)
उवथ के प्रशंसक क्रव्याद अग्नि को मैं पितृयान मार्ग से भेजता हूं. हे क्रव्याद! तू पितरों में ही प्रबुद्ध हो और वहीं जागता रह. देवयान मार्ग द्वारा तू यहां दुबारा मत आ. (८)
I send Kravyad Agni, a fan of Uwath, via Pitrayan route. O Kravyad! You are enlightened in your ancestors and stay awake there. Do not come here again by the way of God. (8)