अथर्ववेद (कांड 12)
नवं॑ ब॒र्हिरो॑द॒नाय॑ स्तृणीत प्रि॒यं हृ॒दश्चक्षु॑षो व॒ल्ग्वस्तु । तस्मि॑न्दे॒वाः स॒ह दै॒वीर्वि॑शन्त्वि॒मं प्राश्न॑न्त्वृ॒तुभि॑र्नि॒षद्य॑ ॥ (३२)
ओदन रखने के लिए नवीन कुशा फैला दो. यह कुशा का आसन हृदय और नेत्रों को सुंदर लगे. देवता उस पर अपनी पत्नियों सहित विराजमान होते हुए इस ओदन का सेवन करें. (३२)
Spread a new skillet to keep the odan. This kusha asana looks beautiful to the heart and eyes. The gods should sit on it with their wives and consume this odan. (32)