अथर्ववेद (कांड 12)
वसो॒र्या धारा॒ मधु॑ना॒ प्रपी॑ना घृ॒तेन॑ मि॒श्रा अ॒मृत॑स्य॒ नाभ॑यः । सर्वा॒स्ता अव॑ रुन्धे स्व॒र्गः ष॒ष्ट्यां श॒रत्सु॑ निधि॒पा अ॒भीच्छा॑त् ॥ (४१)
वसुयुक्त ओदन की मधु के द्वारा मोटी बनी हुई धाराएं घी से मिली हुई हैं. स्वर्ग अमृत की थाली के समान है. स्वर्ग इन को रोकता है. वसु की धाराएं निधि की रक्षक हैं. मनुष्य साठ वर्ष की अवस्था में इन की इच्छा करे. (४१)
The thick streams made by the honey of Vasukt Odan are mixed with ghee. Heaven is like a plate of nectar. Heaven stops these. Vasu sections are the protectors of the fund. Man should wish them at the age of sixty years. (41)