हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.3.45

कांड 12 → सूक्त 3 → मंत्र 45 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
इ॒दं प्राप॑मुत्त॒मं काण्ड॑मस्य॒ यस्मा॑ल्लो॒कात्प॑रमे॒ष्ठी स॒माप॑ । आ सि॑ञ्च स॒र्पिर्घृ॒तव॒त्सम॑ङ्ग्ध्ये॒ष भा॒गो अङ्गि॑रसो नो॒ अत्र॑ ॥ (४५)
प्रजापति ने जिस दिखाई देते हुए कांड के द्वारा फल प्राप्त किया था. उस उत्तम कांड को मैं ने भी प्राप्त कर लिया है. इसे घृत से सींचो. यह घृत युक्त भाग हम अंगिरा गोत्र वाले ऋषियों का है. (४५)
Prajapati had obtained the fruit through the scandal that appeared. I have also received that excellent scandal. Irrigate it with ghee. This disgusting part belongs to us sages of the Angira gotra. (45)