अथर्ववेद (कांड 12)
आ॑दि॒त्येभ्यो॒ अङ्गि॑रोभ्यो॒ मध्वि॒दं घृ॒तेन॑ मि॒श्रं प्रति॑ वेदयामि । शु॒द्धह॑स्तौ ब्राह्मण॒स्यानि॑हत्यै॒तं स्व॒र्गं सु॑कृता॒वपी॑तम् ॥ (४४)
मैं यह घृत युक्त मधु आंगिरसों तथा आदित्यों के हेतु निवेदित करता हूं. ब्राह्मण के पवित्र हाथ फल के रूप में इस ओदन को स्वर्ग में पहुंचाएं. (४४)
I make this request for the grateful Madhu Angiras and Adityas. The holy hand of the Brahmin should bring this odan to heaven as a fruit. (44)