अथर्ववेद (कांड 12)
प्राच्यै॑ त्वा दि॒शे॒ग्नयेऽधि॑पतयेऽसि॒ताय॑ रक्षि॒त्र आ॑दि॒त्यायेषु॑मते । ए॒तं परि॑ दद्म॒स्तं नो॑ गोपाय॒तास्माक॒मैतोः॑ । दि॒ष्टं नो॒ अत्र॑ ज॒रसे॒ नि ने॑षज्ज॒रा मृ॒त्यवे॒ परि॑ णो ददा॒त्वथ॑ प॒क्वेन॑ स॒ह सं भ॑वेम ॥ (५५)
हम तुझे पूर्व दिशा, अग्नि, काले सर्प और आदित्य को दान करते हैं. तू हमारे यहां से जाने तक इस पुरुष की रक्षा कर. इसे वृद्धावस्था तक हम को माननीय रूप में प्राप्त कराओ. हमारी वृद्धावस्था ही इसे मृत्यु प्रदान करें. हम इस पके हुए ओदन सहित स्वर्ग वासी होते हुए आनंद को प्राप्त करें. (५५)
We donate you to east direction, agni, black snake and aditya. Protect this man until we leave. Get it as honorable till old age. May our old age give it death. May we attain bliss by being heavenly with this ripe odan. (55)