अथर्ववेद (कांड 12)
त॒न्वं स्व॒र्गो ब॑हु॒धा वि च॑क्रे॒ यथा॑ वि॒द आ॒त्मन्न॒न्यव॑र्णाम् । अपा॑जैत्कृ॒ष्णां रुश॑तीं पुना॒नो या लोहि॑नी॒ तां ते॑ अ॒ग्नौ जु॑होमि ॥ (५४)
यह ओदन स्वर्ग में अपनेआप को उसी प्रकार अनेक आकार वाला बना लेने में समर्थ है. जिस प्रकार आत्मा ज्ञानी को अनेक प्रकार का बना देता है तथा कालिमा को शुद्ध करता जाता है, उसी प्रकार मैं तेरे रूप को अग्ने में होम करता हूं. (५४)
This odan is capable of making itself of many shapes in heaven in the same way. Just as the soul makes the wise person of many kinds and purifies the kalima, in the same way I burn Your form in the agni. (54)