अथर्ववेद (कांड 12)
उदी॑च्यै त्वा दि॒शे सोमा॒याधि॑पतये स्व॒जाय॑ रक्षि॒त्रेऽशन्या॒ इषु॑मत्यै । ए॒तं परि॑ दद्म॒स्तं नो॑ गोपाय॒तास्माक॒मैतोः॑ । दि॒ष्टं नो॒ अत्र॑ ज॒रसे॒ नि ने॑षज्ज॒रा मृ॒त्यवे॒ परि॑ णो ददा॒त्वथ॑ प॒क्वेन॑ स॒ह सं भ॑वेम ॥ (५८)
हम तुझे उत्तर दिशा, सोम, स्वज नामक सर्प एवं अशनि को प्रदान करते हैं. तू हमारे यहां से प्रस्थान करने तक इस की रक्षा कर. इसे वृद्धावस्था तक भाग्य के रूप में हमें प्राप्त करा. हमारी वृद्धावस्था इसे मृत्यु प्रदान करे. मरने पर हम इस पके हुए ओदन के साथ स्वर्ग में आनंद प्राप्त करें. (५८)
We give you the north direction, the serpent named Som, Swaj and Ashani. Protect it until we leave here. Let us get it in the form of luck till old age. May our old age give it death. When we die, let us find joy in heaven with this baked odan. (58)