अथर्ववेद (कांड 12)
ध्रु॒वायै॑ त्वा दि॒शे विष्ण॒वेऽधि॑पतये क॒ल्माष॑ग्रीवाय रक्षि॒त्र ओष॑धीभ्य॒ इषु॑मतीभ्यः । ए॒तं परि॑ दद्म॒स्तं नो॑ गोपाय॒तास्माक॒मैतोः॑ । दि॒ष्टं नो॒ अत्र॑ ज॒रसे॒ नि ने॑षज्ज॒रा मृ॒त्यवे॒ परि॑ णो ददा॒त्वथ॑ प॒क्वेन॑ स॒ह सं भ॑वेम ॥ (५९)
हे ओदन! हम तुझे ध्रुव अर्थात् नीचे की ओर वाली दिशा, उस के अधिपति विष्णु, संरक्षण कर्ता कल्माष ग्रीव नामक सर्प और इषुमती ओषधियों को देते हैं. तुम हमारे जाने के समय तक इस की रक्षा करो. उसे हमारे कमों के फल स्वरूप जीर्ण अवस्था प्राप्त कराओ. जीर्णावस्था इसे मृत्यु को सौंपे. इस पके हुए अन्न के साथ हम पुनः उत्पन्न होंगे. (५९)
O O O O Son! We give you dhruva i.e. downward direction, its ruler Vishnu, the protector Kalmash Greeva, and the Ishumati medicines. You protect this until the time we go. Make him attain a dilapidated state as a result of our shortcomings. The old age entrusts it to death. With this cooked grain we will be born again. (59)