हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.4.16

कांड 12 → सूक्त 4 → मंत्र 16 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 4
चरे॑दे॒वा त्रै॑हाय॒णादवि॑ज्ञातगदा स॒ती । व॒शां च॑ वि॒द्यान्ना॑रद ब्राह्म॒णास्तर्ह्ये॒ष्याः ॥ (१६)
हे नारद! यह धेनु अविजात गद अर्थात्‌ रोग को न जानती हुई तीन वर्ष तक विचरण करे अथवा घास आदि खाए. यजमान इस के बाद इस धेनु को वशा मानता हुआ ब्राह्मणों की खोज करे. (१६)
O Narada! This dhenu should roam for three years without knowing the disease or eat grass etc. After this, the host should consider this Dhenu as a matter and search for Brahmins. (16)