अथर्ववेद (कांड 12)
यो अ॑स्या॒ ऊधो॒ न वे॒दाथो॑ अस्या॒ स्तना॑नु॒त । उ॒भये॑नै॒वास्मै॑ दुहे॒ दातुं॒ चेदश॑कद्व॒शाम् ॥ (१८)
जो मनुष्य इस वशा के थनों और ऊधस अर्थात् ऐन को जानता हुआ इस का दान करता है, यह वशा उसे अपने थनों और उन दोनों के द्वारा फल देने वाली होती है. (१८)
The person who donates this vasa to the udders and the udhas i.e. ain, this vasha is going to give him fruit through his udders and both of them. (18)