अथर्ववेद (कांड 12)
पु॑रो॒डाश॑वत्सा सु॒दुघा॑ लो॒केऽस्मा॒ उप॑ तिष्ठति । सास्मै॒ सर्वा॒न्कामा॑न्व॒शा प्र॑द॒दुषे॑ दुहे ॥ (३५)
सुंदरता और सुख से दुहाने वाली वशा इस लोक में यजमान के पास रहती है. यजमान जब वशा का दान करता है तो वह उसे सभी अभीष्ट प्रदान करती है. (३५)
Vasha, who is brimming with beauty and happiness, lives with the host in this world. When the host donates vasha, she gives him all the wishes. (35)