अथर्ववेद (कांड 13)
वाच॑स्पते पृथि॒वी नः॑ स्यो॒ना स्यो॒ना योनि॒स्तल्पा॑ नः सु॒शेवा॑ । इ॒हैव प्रा॒णः स॒ख्ये नो॑ अस्तु॒ तं त्वा॑ परमेष्ठि॒न्पर्य॒ग्निरायु॑षा॒ वर्च॑सा दधातु ॥ (१७)
हे वाचस्पति! हमारे लिए पृथ्वी, योनि और शय्या सुख देने वाली हों. प्राण हमारे लिए सुख देने वाला हो. हम दीर्घ जीवी हों हे परमेष्ठी! ये अग्नि देव हमें दीघार्यु और तेजस्वी बनाएं. (१७)
O Vachaspati! For us, the earth, vagina and bed should be happy. May life give us happiness. May we be long-lived, O God! May this Agni God make us digharyu and stunning. (17)