अथर्ववेद (कांड 13)
वि मि॑मीष्व॒ पय॑स्वतीं घृ॒ताचीं॑ दे॒वानां॑ धे॒नुरन॑पस्पृगे॒षा । इन्द्रः॒ सोमं॑ पिबतु॒ क्षेमो॑ अस्त्व॒ग्निः प्र स्तौ॑तु॒ वि मृधो॑ नुदस्व ॥ (२७)
हे यजमान! तुम देवताओं की दुधारू और पूजनीय गौ का मान करने के कारण अन्यों को स्पर्श करने वाले अर्थात् पराजित करने वाले हो. अग्नि तुम्हारा कुशलमंगल करें तथा इंद्र देव सोम रस का पान करें. इस के बाद तू शत्रुओं को युद्धस्थल से खदेड़ दे. (२७)
O host! You are the one who touches others because of the milch and revered cow of the gods. May agni make you efficient and drink Indra Dev Som Rasa. After this, you drive the enemies out of the battlefield. (27)