अथर्ववेद (कांड 13)
अग्ने॑ स॒पत्ना॒नध॑रान्पादया॒स्मद्व्य॒थया॑ सजा॒तमु॒त्पिपा॑नं बृहस्पते । इन्द्रा॑ग्नी॒ मित्रा॑वरुणा॒वध॑रे पद्यन्ता॒मप्र॑तिमन्यूयमानाः ॥ (३१)
हे अग्नि! तुम हमारे शत्रुओं को पतित बनाओ. हे बृहस्पति! तुम उन्नतिशील होते हुए हमारे शत्रुओं का संतप्त करो. इंद्र, अग्नि, मित्र और वरुण देवता हमारे शत्रुओं का विरोध करें. हमारे शत्रु पतित हो जाएं. (३१)
O agni! You make our enemies impure. O Jupiter! You should prosper and satisfy our enemies. May Indra, Agni, Mitra and Varuna Devta oppose our enemies. Let our enemies degenerate. (31)