हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 13.1.33

कांड 13 → सूक्त 1 → मंत्र 33 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
व॒त्सो वि॒राजो॑ वृष॒भो म॑ती॒नामा रु॑रोह शु॒क्रपृ॑ष्ठो॒ऽन्तरि॑क्षम् । घृ॒तेना॒र्कम॒भ्यर्चन्ति व॒त्सं ब्रह्म॒ सन्तं॒ ब्रह्म॑णा वर्धयन्ति ॥ (३३)
विराट्‌ के वत्स सूर्य अंतरिक्ष अर्थात्‌ आकाश पर चढ़ते हैं. सूर्य रूप वत्स जब ब्रह्म हो जाते हैं, तभी वे ब्राह्मण उन्हें घृत से बढ़ाते हैं और मंत्रों के द्वारा उन की पूजा करते हैं. (३३)
The sun of virat climbs on space i.e. sky. When the Sun Form Vatsa becomes Brahman, then those Brahmins increase them with ghee and worship them through mantras. (33)