हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 13.1.34

कांड 13 → सूक्त 1 → मंत्र 34 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
दिवं॑ च॒ रोह॑ पृथि॒वीं च॑ रोह रा॒ष्ट्रं च॒ रोह॒ द्रवि॑णं च रोह । प्र॒जां च॒ रोहा॒मृतं॑ च रोह॒ रोहि॑तेन त॒न्वं सं स्पृ॑शस्व ॥ (३४)
हे राजन्‌! तुम पृथ्वी पर अधिछित रहो. तुम राष्ट्र और धन पर अधिषित रहो. तुम छत्र के समान प्रजाओं पर छाया करते रहो. तुम अमृत पर अधिषित होते हुए सूर्य का स्पर्श करने वाले बनो तथा स्वर्ग पर आरोहण करो. (३४)
O king! You stay overlooked on earth. You dominate the nation and wealth. Continue to cast a shadow on the people like an umbrella. You should be the toucher of the sun while being overhead of nectar and ascend to heaven. (34)