अथर्ववेद (कांड 13)
रोहि॑ते॒ द्यावा॑पृथि॒वी अधि॑ श्रि॒ते व॑सु॒जिति॑ गो॒जिति॑ संधना॒जिति॑ । स॒हस्रं॒ यस्य॒ जनि॑मानि स॒प्त च॑ वो॒चेयं॑ ते॒ नाभिं॒ भुव॑न॒स्याधि॑ म॒ज्मनि॑ ॥ (३७)
वसुजित, गोजित और साधनाजित नामक रोहित में आकाश और पृथ्वी स्थित हैं. मैं उन के सहस्त्र प्रादुर्भावो का वर्णन करता हुआ उन्हें लोक की महिमा का केंद्र मानता हूं. (३७)
The sky and earth are located in Rohith named Vasujit, Gojit and Sadhanajit. I describe his thousand appearances and consider him as the center of the glory of the people. (37)