हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 13.1.40

कांड 13 → सूक्त 1 → मंत्र 40 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
दे॒वो दे॒वान्म॑र्चयस्य॒न्तश्च॑रस्यर्ण॒वे । स॑मा॒नम॒ग्निमि॑न्धते॒ तं वि॑दुः क॒वयः॒ परे॑ ॥ (४०)
हे सूर्य! तुम देवता हो कर भी अन्य देवताओं को कर्म में प्रेरित करते हो तथा आकाश में घूमते हो. सूर्य अपने समान तेजस्वी अग्नि को प्रदीप्त करते हैं. ज्ञानी जन ऐसे सूर्य को जानते हैं. (४०)
O sun! Even though you are deities, you inspire other gods in action and roam in the sky. The sun illuminates the bright agni like itself. Knowledgeable people know such a sun. (40)