हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 13.1.46

कांड 13 → सूक्त 1 → मंत्र 46 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
उ॒र्वीरा॑सन्परि॒धयो॒ वेदि॒र्भूमि॑रकल्पत । तत्रै॒ताव॒ग्नी आध॑त्त हि॒मं घ्रं॒सं च॒ रोहि॑तः ॥ (४६)
भूमिरूपी वेदी पर यज्ञ का अनुष्ठान हुआ. इस यज्ञ की परिधियां विस्तृत थीं. वहीं पर शीतकाल और ग्रीष्म काल रूपी दो अग्नियों का आधान किया गया. (४६)
The ritual of yajna took place on the bhumiroopi altar. The perimeters of this yajna were wide. At the same time, two agnis of winter and summer were worshiped. (46)