हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 13.3.11

कांड 13 → सूक्त 3 → मंत्र 11 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
बृ॒हदे॑न॒मनु॑ वस्ते पु॒रस्ता॑द्रथन्त॒रं प्रति॑ गृह्णाति प॒श्चात् । ज्योति॒र्वसा॑ने॒ सद॒मप्र॑मादम् । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (११)
जिस के अनुकूल रह कर बृहत्‌ आच्छादन करता और रथंतर उसे धारण करता है, वे दोनों ही जातियों से सदैव ढके रहते हैं. ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी एवं विद्वान्‌ ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ अपने पाशों से बांध दो. (११)
The one who is compatible with which the great cover and the charioteer holds it, they are always covered with both jatis. O Rohit Dev, the criminal of such an angry God and the violent of the learned Brahmin! Make you staggered while tying it to your loops. (11)