अथर्ववेद (कांड 13)
बृ॒हद॒न्यतः॑ प॒क्ष आसी॑द्रथन्त॒रम॒न्यतः॒ सब॑ले स॒ध्रीची॑ । यद्रोहि॑त॒मज॑नयन्त दे॒वाः । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (१२)
देवताओं द्वारा रोहित को उत्पन्न करने के समय बृहत् एक ओर तथा रथंतर दूसरी ओर हुए. ये दोनों ही शक्तिशाली और साथ रहने वाले पक्ष हैं. इस क्रोधवंत देव के अपराधी और विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने बंधन में बांध लो. (१२)
At the time of the creation of Rohith by the gods, Brihat was on one side and Rathantar on the other side. Both of these are powerful and co-living sides. O Rohit Dev, the criminal of this angry God and the violent of the learned Brahmin! Staggering and make it weak and tie it in your bond. (12)