अथर्ववेद (कांड 13)
शु॒क्रं व॑हन्ति॒ हर॑यो रघु॒ष्यदो॑ दे॒वं दि॒वि वर्च॑सा॒ भ्राज॑मानम् । यस्यो॒र्ध्वा दिवं॑ त॒न्वस्तप॑न्त्य॒र्वाङ्सु॒वर्णैः॑ पट॒रैर्वि भाति॑ । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (१६)
स्वर्ग में अपने तेज से दमकते हुए सूर्य को उन की द्रुतगामी रशिमियां निर्मल रस प्राप्त कराती हैं उन की देह के ऊर्ध्व भाग रूप रशिमियां स्वर्ग को संतप्त करती हैं. जो स्वर्णिम रश्मियों द्वारा प्रकाश फैलाते हैं, उन क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाशों से बांध दो. (१६)
While shining with its brightness in heaven, their fast rashamis get pure juice, the upper part of their body, the rashhimis curse heaven. Those who spread light through golden rays, o Rohit Dev, the criminal of those angry gods and the violent of the learned Brahmin! Make you staggered attenuated and tie to your loops. (16)