अथर्ववेद (कांड 13)
येना॑दि॒त्यान्ह॒रितः॑ सं॒वह॑न्ति॒ येन॑ य॒ज्ञेन॑ ब॒हवो॒ यन्ति॑ प्रजा॒नन्तः॑ । यदेकं॒ ज्योति॑र्बहु॒धा वि॒भाति॑ । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (१७)
जिन के प्रभाव से सूर्य के अश्च सूर्य को वहन करते हैं तथा जिन के प्रभाव से विज्ञ पुरुष यज्ञ आदि कर्मो को प्राप्त होते हैं, जो एक ज्योति होते हुए भी अनेक रूप से प्रकाशमान हैं, ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों से बांधो. (१७)
Under whose influence the tears of the sun carry the sun and under whose influence the wise men get the sacrifice etc., which, despite being a light, are illuminated in many ways, o Rohit Dev, the criminal of such an angry God and the violent of the learned Brahmin! You vibrate and make it weak and tie it to your loops. (17)