अथर्ववेद (कांड 13)
अ॑ष्ट॒धा यु॒क्तो वह॑ति॒ वह्नि॑रु॒ग्रः पि॒ता दे॒वानां॑ जनि॒ता म॑ती॒नाम् । ऋ॒तस्य॒ तन्तुं॒ मन॑सा मि॒मानः॒ सर्वा॒ दिशः॑ पवते मात॒रिश्वा॑ । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (१९)
आठ प्रकार से बहने वाले अग्नि उग्र हैं. वे देवों के पालक तथा बुद्धियों को उत्पन्न करने वाले हैं. ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाः सम्यञ्चं तन्तुं प्रदिशो नु सर्वा अन्तर्गायत्र्याममृतस्य तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति गायत्री में, अमृत के गर्भ में तथा सभी दिशा करते हैं. उन क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाः न् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम शों से बांध दो. (१९)
The agni flowing in eight types is fierce. They are the guardians of gods and the creators of the intellects. Make such an angry God weak by trembling and weakening him, and all the elements of his soul are worshiped, and all the directions are given by the swami, in the womb of nectar, in the womb of nectar, and in all directions. Make those angry gods weak by making them weak by the criminals and scholars, and make them violent of your father brahmin, O Rohit Dev! Tie it up with a sword. (19)