हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 14.1.33

कांड 14 → सूक्त 1 → मंत्र 33 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 14)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
इ॒मं गा॑वःप्र॒जया॒ सं वि॑शाथा॒यं दे॒वानां॒ न मि॑नाति भा॒गम् । अ॒स्मै वः॑ पू॒षाम॒रुत॑श्च॒ सर्वे॑ अ॒स्मै वो॑ धा॒ता स॑वि॒ता सु॑वाति ॥ (३३)
हे गायो! तुम इस के घर में अपनी संतान के साथ प्रवेश करो. यह मनुष्य देवों के भाग का लोप नहीं करता. विधाता और सविता तुम्हें दूसरे मनुष्य के लिए उत्पन्न करते हैं. (३३)
O sing! You enter this house with your offspring. This man does not disappear the part of the gods. Vidhata and Savita produce you for another human being. (33)