हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 14.1.48

कांड 14 → सूक्त 1 → मंत्र 48 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 14)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
येना॒ग्निर॒स्याभूम्या॑ हस्तं ज॒ग्राह॒ दक्षि॑णम् । तेन॑ गृह्णामि ते॒ हस्तं॒ मा व्य॑थिष्ठा॒मया॑ स॒ह प्र॒जया॑ च॒ धने॑न च ॥ (४८)
जिस कारण अग्नि ने इस भूमि का दायां हाथ ग्रहण किया है, उसी उद्देश्य से मैं तेरा हाथ पकड़ता हूं. तू दुःख मत कर. तू मेरे साथ प्रजा अर्थात्‌ संतान और धन के साथ निवास कर. (४८)
For the purpose that agni has taken the right hand of this land, I hold your hand for the same purpose. Don't hurt. Dwell with me with people, children and wealth. (48)