अथर्ववेद (कांड 14)
सु॑किंशु॒कंव॑ह॒तुं वि॒श्वरू॑पं॒ हिर॑ण्यवर्णं सु॒वृतं॑ सुच॒क्रम् । आ रो॑ह सूर्येअ॒मृत॑स्य लो॒कं स्यो॒नं पति॑भ्यो वह॒तुं कृ॑णु॒ त्वम् ॥ (६१)
हे सूर्या! तू उत्तम पुष्पों वाले, अनेक रूप वाले तथा चमकने वाले अनेक रंगों से सुशोभित इस रथ पर आसीन हो. जो उत्तम वेष्टनों वाला तथा सुंदर पहियों वाला है. तू अमृत के लोक पर पहुंच तथा विवाह के उपहार के रूप में प्राप्त इसे अपने पति के लिए सुखदायक बना. (६१)
O Sun! You are seated on this chariot adorned with fine flowers, many forms and many colors that shine. Which is well dressed and has beautiful wheels. You reach the world of nectar and receive it as the gift of marriage make it soothing for your husband. (61)