अथर्ववेद (कांड 14)
उत्ति॑ष्ठे॒तःकिमि॒च्छन्ती॒दमागा॑ अ॒हं त्वे॑डे अभि॒भूः स्वाद्गृ॒हात् । शू॑न्यै॒षी नि॑रृते॒याज॒गन्धोत्ति॑ष्ठाराते॒ प्र प॑त॒ मेह रं॑स्थाः ॥ (१९)
हे निर्ऋति! तू यहां से उठ कर भाग. तू किसी वस्तु की इच्छा से यहां उपस्थित हुई है. मैं तुझे अपने घर से भगाता हुआ तेरा सत्कार करता हूं. तू शुभ रूपिणी है तथा शून्य बनाने की इच्छा से यहां आई है, परंतु तू यहां विहार मत कर. (१९)
O nirvati! You get up from here and run away. You have been here out of the desire of something. I welcome you away from my house. You are an auspicious heroine and have come here with the desire to create zero, but do not wander here. (19)