हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 14.2.55

कांड 14 → सूक्त 2 → मंत्र 55 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 14)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
बृह॒स्पति॒नाव॑सृष्टां॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॑धारयन् । भगो॒ गोषु॒ प्रवि॑ष्टो॒यस्तेने॒मां सं सृ॑जामसि ॥ (५५)
बृहस्पति द्वारा विरचित इस ओषधि को विश्वे देवों ने धारण किया था. जो भग गायों में प्रवेश कर चुका है, हम इस ओषधि को उस भग से संपन्न करते हैं. (५५)
This medicine, created by Jupiter, was worn by the world gods. We endow this medicine with the bhaga that has entered the cows. (55)