अथर्ववेद (कांड 15)
आ दे॒वेषु॑वृश्चते अहु॒तम॑स्य भवति ॥ (१०)
उस का हवन विफल होता है और वह देवों का अपराधी होता है. (१०)
His havan fails and he is the culprit of the gods. (10)
कांड 15 → सूक्त 12 → मंत्र 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation