हरि ॐ
अथर्ववेद (Atharvaved)
अथर्ववेद (कांड 15)
तस्य॒व्रात्य॑स्य ॥ (१)
इस व्रात्य का दक्षिण चक्षु आदित्य है. (१)
Aditya is the south eye of this vratya. (1)
अथर्ववेद (कांड 15)
यद॑स्य॒दक्षि॑ण॒मक्ष्य॒सौ स आ॑दि॒त्यो यद॑स्य स॒व्यमक्ष्य॒सौ स च॒न्द्रमाः॑ ॥ (२)
इस का वाम चक्षु चंद्रमा है. (२)
Its left eye is the moon. (2)
अथर्ववेद (कांड 15)
योऽस्य॒दक्षि॑णः॒ कर्णो॒ऽयं सो अ॒ग्निर्योऽस्य॑ स॒व्यः कर्णो॒ऽयं स पव॑मानः ॥ (३)
इस का दाहिना कान अग्नि और बायां कान पवमान है. (३)
Its right ear is agni and the left ear is poman. (3)
अथर्ववेद (कांड 15)
अ॑होरा॒त्रेनासि॑के॒ दिति॒श्चादि॑तिश्च शीर्षकपा॒ले सं॑वत्स॒रः शिरः॑ ॥ (४)
इस की नासिका दिन और रात हैं. इस का शीर्ष दिति और कपाल अदिति है. इस का शीश संवत्सर है. (४)
The nose of this is day and night. The top of this is Diti and Kapal Aditi. The head of this is Samvatsar. (4)
अथर्ववेद (कांड 15)
अह्ना॑प्र॒त्यङ्व्रात्यो॒ रात्र्या॒ प्राङ्नमो॒ व्रात्या॑य ॥ (५)
यह व्रात्य दिन में सबके लिए पूज्य है. इस प्रकार के व्रात्य को नमस्कार है. (५)
It is revered for everyone on the day. Salutations to this type of vratya. (5)