अथर्ववेद (कांड 15)
तं श्र॒द्धा च॑य॒ज्ञश्च॑ लो॒कश्चान्नं॑ चा॒न्नाद्यं॑ च भू॒त्वाभि॑प॒र्याव॑र्तन्त ॥ (४)
श्रद्धा, यज्ञ, लोक अन्न और खानपान उस के चारों ओर रहने लगे. (४)
Reverence, yajna, folk food and food started living around him. (4)
कांड 15 → सूक्त 7 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation