हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 15)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
स म॑हि॒मासद्रु॑र्भू॒त्वान्तं॑ पृथि॒व्या अ॑गच्छ॒त्स स॑मु॒द्रोऽभ॑वत् ॥ (१)
वह बड़ा समर्थ और गतिशाली हो कर पृथ्वी के अंत तक गया है और वह सागर बन गया. (१)
He has become very capable and dynamic and has gone to the end of the earth and he has become an ocean. (1)

अथर्ववेद (कांड 15)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
तं प्र॒जाप॑तिश्चपरमे॒ष्ठी च॑ पि॒ता च॑ पिताम॒हश्चाप॑श्च श्र॒द्धा च॑ व॒र्षंभू॒त्वानु॒व्यवर्तयन्त ॥ (२)
उस के साथ प्रजापति, परमेष्ठी, पिता, पितामह श्रद्धा और वृष्टि हो कर रहने लगे. (२)
Prajapati, Parmeshti, Father, Pitamah shraddha and Vrishti started living with him. (2)

अथर्ववेद (कांड 15)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
ऐन॒मापो॑गच्छ॒त्यैनं॑ श्र॒द्धा ग॑च्छ॒त्यैनं॑ व॒र्षं ग॑च्छति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ (३)
जो इस बात को जानता है, जल उसे प्राप्त होते हैं. उसे श्रद्धा और वर्षा प्राप्त होती है. (३)
He who knows this, he gets water. He receives reverence and rain. (3)

अथर्ववेद (कांड 15)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
तं श्र॒द्धा च॑य॒ज्ञश्च॑ लो॒कश्चान्नं॑ चा॒न्नाद्यं॑ च भू॒त्वाभि॑प॒र्याव॑र्तन्त ॥ (४)
श्रद्धा, यज्ञ, लोक अन्न और खानपान उस के चारों ओर रहने लगे. (४)
Reverence, yajna, folk food and food started living around him. (4)

अथर्ववेद (कांड 15)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
ऐनं॑ श्र॒द्धाग॑च्छ॒त्यैनं॑ य॒ज्ञो ग॑च्छ॒त्यैनं॑ लो॒को ग॑च्छ॒त्यैन॒मन्नं॑ गच्छ॒त्यैन॑म॒न्नाद्यं॑गच्छति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ (५)
जो यह जानता है, उसे श्रद्धा प्राप्त होती है, उसे लोक प्राप्त होते हैं. उस को अन्न प्राप्त होता है और उस को खानपान प्राप्त होता है. (५)
He who knows this receives faith, he receives the world. He gets food and he gets food. (5)