हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 17.1.19

कांड 17 → सूक्त 1 → मंत्र 19 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 17)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
अस॑ति॒सत्प्रति॑ष्ठितं स॒ति भू॒तं प्रति॑ष्ठितम् । भू॒तं ह॒ भव्य॒ आहि॑तं॒ भव्यं॑भू॒ते प्रति॑ष्ठितं॒ तवेद्वि॑ष्णो बहु॒धावी॒र्याणि । त्वं नः॑ पृणीहिप॒शुभि॑र्वि॒श्वरू॑पैः सु॒धायां॑ मा धेहि पर॒मे व्योमन् ॥ (१९)
यह दृश्यमान जगत्‌ निराकार ब्रह्म में प्रतिष्ठित है. इस दृश्यमान जगत्‌ में पृथ्वी आदि पांच तत्त्व प्रतिष्ठित हैं. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी ही शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम हमें गौ, अश्च आदि सभी रूप के पशुओं से पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा स्थित है, उस में हमें स्थापित करो. (१९)
This visible world is distinguished in the formless Brahman. In this visible world, five elements like earth etc. are distinguished. O broad sun! Your own powers are of many kinds. May you complete us with animals of all forms of cow, ashcha etc. and establish us in the sudha that is located in the supreme vyom. (19)