अथर्ववेद (कांड 17)
रुचि॑रसि रो॒चोऽसि॑ । स यथा॒ त्वं रुच्या॑ रो॒चोऽस्ये॒वाहं प॒शुभि॑श्च ब्राह्मणवर्च॒सेन॑ चरुचिषीय ॥ (२१)
हे सूर्य! तुम दीप्ति रूप हो तथा दूसरों को दीप्ति वाला बनाते हो. तुम जिस प्रकार दीप्ति से दीप्ति मग्न हो, उसी प्रकार मैं पशुओं तथा ब्राह्मणोचित तेज से संपन्न बनूं. (२१)
O sun! You are a bright form and make others radiant. Just as you are filled with radiance, so should I be endowed with animals and Brahmanical glory. (21)