हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 17.1.28

कांड 17 → सूक्त 1 → मंत्र 28 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 17)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
परि॑वृतो॒ब्रह्म॑णा॒ वर्म॑णा॒हं क॑श्यपस्य॒ ज्योति॑षा॒ वर्च॑सा च । मा मा॒प्राप॒न्निष॑वो॒ दैव्या॒ या मा मानु॑षी॒रव॑सृष्टाः व॒धाय॑ ॥ (२८)
मैं कश्यप रूपी सूर्य के मंत्र रूपी कवच से ढका हुआ हूं तथा सत्य और रक्षा करने वाली किरणों से आच्छादित हूं. इसलिए मनुष्य और देवता मेरी हिंसा करने के लिए जिन आयुधों का प्रयोग करते हैं, वे मुझे प्रभावित नहीं कर सकेंगे. (२८)
I am covered with the shield of the mantra of the Sun in the form of Kashyapa and covered with the rays of truth and protection. Therefore, the weapons used by humans and gods to do my violence will not be able to affect me. (28)