अथर्ववेद (कांड 18)
सदा॑सि र॒ण्वोयव॑सेव॒ पुष्य॑ते॒ होत्रा॑भिरग्ने॒ मनु॑षः स्वध्व॒रः । विप्र॑स्य वा॒ यच्छ॑शमा॒नउ॒क्थ्यो॒ वाजं॑ सस॒वाँ उ॑प॒यासि॒ भूरि॑भिः ॥ (२२)
हे अग्नि! तुम यज्ञ को सुंदरतापूर्वक पूर्ण करते हो. जिस प्रकार हरी घास आदि को खाने वाला पशु अपने पालने वाले को सुंदर दिखाई देता है, उसी प्रकार घृत आदि से अपनेआप को पुष्ट करने वाले यजमान के लिए तुम दर्शनीय हो जाते हो. (२२)
O agni! You complete the yajna beautifully. Just as the animal that eats green grass etc. looks beautiful to its rearer, in the same way you become visible to the host who strengthens himself with ghee etc. (22)