हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 18.2.20

कांड 18 → सूक्त 2 → मंत्र 20 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
अ॑संबा॒धेपृ॑थि॒व्या उ॒रौ लो॒के नि धी॑यस्व । स्व॒धा याश्च॑कृ॒षे जीव॒न्तास्ते॑ सन्तुमधु॒श्चुतः॑ ॥ (२०)
हे मरने वाले पुरुष! तू यज्ञ आदि की वेदी के विस्तृत स्थान में प्रतिष्ठित हो. पहले तू ने जिन उत्तम हवियों को दिया है, वे तुझे मधु आदि रसों के रूप में प्राप्त हों. (२०)
O dying man! You are distinguished in the wide space of the altar of yajna etc. First, the best wives that you have given you, you should get them in the form of juices like honey etc. (20)