हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 18.2.23

कांड 18 → सूक्त 2 → मंत्र 23 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
उद॑ह्व॒मायु॒रायु॑षे॒ क्रत्वे॒ दक्षा॑य जी॒वसे॑ । स्वान्ग॑च्छतु ते॒ मनो॒ अधा॑पि॒तॄँरुप॑ द्रव ॥ (२३)
हे प्रेत! प्राणन अर्थात्‌ सांस लेने और अपानन अर्थात्‌ अपान वायु छोड़ने के व्यापार अर्थात्‌ कार्य के लिए मैं तेरी आयु का आह्वान करता हूं. तेरा मन संस्कार से उत्पन्न नवीन शरीर को प्राप्त हो. इस के बाद तू पितरों के समीप पहुंच. (२३)
O ghost! I call upon your age for the business of pranan i.e. breathing and apanaan i.e. leaving the air. May your mind receive a new body born out of sanskar. After this, you reach the ancestors. (23)