हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 18.2.36

कांड 18 → सूक्त 2 → मंत्र 36 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
शं त॑प॒ माति॑तपो॒ अग्ने॒ मा त॒न्वं तपः॑ । वने॑षु॒ शुष्मो॑ अस्तु ते पृथि॒व्याम॑स्तु॒यद्धरः॑ ॥ (३६)
हे अग्नि! इस प्रेत के शरीर को अधिक मत जलाओ. जिस प्रकार इसे सुख मिले, वैसा करो. शोषण करने वाली तुम्हारी ज्वालाएं जंगल में जाएं तथा रस का हरण करने वाला तेज पृथ्वी में रहे. तुम हमारे शरीरों को भस्म मत करो. (३६)
O agni! Do not burn the body of this phantom over. Do it the way it gets happiness. Let your flames that exploit go into the forest and the radiance that removes the juice remain in the earth. Don't you consume our bodies. (36)