अथर्ववेद (कांड 18)
अ॒ग्नेर्वर्म॒परि॒ गोभि॑र्व्ययस्व॒ सं प्रोर्णु॑ष्व॒ मेद॑सा॒ पीव॑सा च । नेत्त्वा॑धृ॒ष्णुर्हर॑सा॒ जर्हृ॑षाणो द॒धृग्वि॑ध॒क्षन्प॑री॒ङ्खया॑तै ॥ (५८)
हे प्रेत! इंद्रियों संबंधी अवयवों से तू अग्नि का पाप निवारक कवच पहन. अपने भीतर विद्यमान स्थूल चरबी से ये अग्नि तुझे अधिक भस्म करने की इच्छा रखते हुए इधरउधर न गिराएं. (५८)
O ghost! With the organs of the senses, you wear the sin-relieving armor of agni. Do not drop this agni here and there, wishing to consume you more from the gross fat present within you. (58)