अथर्ववेद (कांड 18)
धनु॒र्हस्ता॑दा॒ददा॑नो मृ॒तस्य॑ स॒ह क्ष॒त्रेण॒ वर्च॑सा॒ बले॑न । स॒मागृ॑भाय॒वसु॑ भूरि पु॒ष्टम॒र्वाङ्त्वमेह्युप॑ जीवलो॒कम् ॥ (६०)
मृतक क्षत्रिय के हाथ से धनुष ग्रहण करता हुआ मैं तेज और बल से युक्त होऊं. हे धनुष! तू इस जीवित लोक में ही हमारे सामने आ तथा हमें देने के लिए धन ला. (६०)
Taking the bow from the hand of the deceased Kshatriya, I should be sharp and strong. O bow! Come before us in this living world and bring us money to give. (60)