अथर्ववेद (कांड 18)
अ॒ञ्जते॒व्यञ्जते॒ सम॑ञ्जते॒ क्रतुं॑ रिहन्ति॒ मधु॑ना॒भ्यञ्जते । सिन्धो॑रुच्छ्वा॒सेप॒तय॑न्तमु॒क्षणं॑ हिरण्यपा॒वाः प॒शुमा॑सु गृह्णते ॥ (१८)
ऋत्विज् सोमयाग के आरंभ में यजमान की आंखों में अंजन लगाते हैं. सागर की वृद्धि के समय उदय होने वाले, रश्मियों द्वारा देखने वाले तथा प्रकाशमय चंद्रमा की रक्षा करने वाले सोम के रूप में स्थापित करते हुए हम चार थालियों में उस का शोधन करते हैं. (१८)
At the beginning of the Ritvij Somayag, the host's eyes are applied to the eyes. We refine it in four plates, establishing it as a soma that rises at the time of the growth of the ocean, sees it by rays and protects the luminous moon. (18)